Aishwarya Rai को लेकर बनेगी ‘नटनी बिनोदिनी’, सिर्फ हकीकत, फसाना नहीं


-दिनेश ठाकुर
पिछले दो दशक के दौरान कई फिल्मी सितारों की आत्मकथाएं सुर्खियों में रही हैं। चाहे वह दिलीप कुमार की ‘द सब्स्टेंस एंड द शैडो’ हो, देव आनंद की ‘रोमांसिंग विद लाइफ’ हो, वैजयंतीमाला की ‘बॉन्डिंग’ हो या नसीरुद्दीन शाह की ‘एंड देन वन डे।’ किसी भी आत्मकथा से यह आग्रह रहता है कि ‘आधी हकीकत आधा फसाना’ से बचते हुए उसका लेखक अपनी जिंदगी और जमाने के उन पहलुओं को उजागर करे, जो अब तक दुनिया की नजर से अछूते हैं। आत्मकथा का मतलब अभिनंदन-ग्रंथ नहीं होता। फिल्मकार-अभिनेता किशोर साहू की ‘मेरी आत्मकथा’ और शत्रुघ्न सिन्हा की ‘खामोश’ इसीलिए आलोचकों के निशाने पर रहीं कि इनमें येन-केन-प्रकारेण आत्म-प्रशंसा पर ज्यादा ध्यान दिया गया। सितारों की आत्मकथा में उनकी कमजोरियों, खामियों और गलतियों का जिक्र उसे प्रमाणिक बनाता है। बांग्ला अभिनेत्री बिनोदिनी दास की आत्मकथा ‘अमार कथा’ (मेरी कहानी) इस मामले में मील का पत्थर है।

बिनोदिनी दास ने, जो नटनी बिनोदिनी के नाम से भी मशहूर थीं, यह आत्मकथा 1913 में लिखी थी। उस जमाने में प्रचार-प्रसार के माध्यम सीमित थे। अभिनेता-अभिनेत्रियों की जिंदगी तब लोगों के लिए पहेली हुआ करती थी। लिहाजा बिनोदिनी दास की आत्मकथा किसी सनसनी से कम नहीं थी, जिसमें उन्होंने खुद के साथ अपने समय के समाज को भी बेनकाब किया था। वे पहले गणिका थीं। थिएटर से जुडऩे के बाद उन्होंने कई नाटकों में सीता, राधा, द्रोपदी, कैकयी, मोटीबीबी, कपालकुंडला आदि के किरदार जिंदादिली से अदा किए। वे बेचैन रूह वाली हस्ती थीं। सिर्फ 23 साल की उम्र में उन्होंने थिएटर की दुनिया से खुद को अलग कर लिया।

You Must Read This :  कंगना की फोटो को चप्पल मारने वाला वीडियो शेयर कर शिल्पा शिंदे लिखा ऐसा कमेंट, हो सकता नया विवाद

खबर है कि निर्देशक प्रदीप सरकार बिनोदिनी दास पर ‘नटनी बिनोदिनी’ ( Notini Biondini Movie ) नाम से फिल्म बनाने वाले हैं। इसमें शीर्षक किरदार ऐश्वर्या रॉय ( Aishwarya Rai Bachchan ) अदा करेंगी। ऐश्वर्या 46 साल की हैं। उन्हें 23-25 साल की बिनोदिनी कैसे बनाया जाएगा, यह फिलहाल पहेली है। यह उम्मीद जरूर जताई जा सकती है कि यह फिल्म महिलाओं की एक अलग दुनिया को सेल्यूलाइड पर उतारने की बोल्ड कोशिश होगी। प्रदीप सरकार नारी प्रधान फिल्में बनाते रहे हैं। अपनी पहली फिल्म ‘परिणीता’ (विद्या बालन) के लिए उन्होंने नेशनल अवॉर्ड जीता था। उनकी ‘लागा चुनरी में दाग’ (रानी मुखर्जी, कोंकणा सेन शर्मा), ‘मर्दानी’ (रानी मुखर्जी) और ‘हैलीकॉप्टर ईला’ (काजोल) का ताना-बाना भी नारी किरदारों के इर्द-गिर्द बुना गया।

मराठी और हिन्दी सिनेमा की अभिनेत्री हंसा वाडकर की आत्मकथा ‘संगते आइका’ (साथ-साथ सुनो) पर श्याम बेनेगल ने 1977 में स्मिता पाटिल को लेकर ‘भूमिका’ बनाई थी। यह अपने किस्म की उल्लेखनीय फिल्म है, जिसमें हंसा वाडकर का अतीत श्वेत-श्याम और वर्तमान रंगीन दिखाया गया था। हर कलाकार को रंगों तक पहुंचने के लिए संघर्ष की लम्बी पगडंडियां तय करनी पड़ती हैं। बशीर बद्र का शेर है- ‘ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं/ तुमने मेरा कांटों भरा बिस्तर नहीं देखा।’





Source link

Posts You May Love to Read !!

Leave a Comment