-दिनेश ठाकुर
सूचना-प्रसारण मंत्रालय के फिल्म प्रभाग ने हिन्दी दिवस ( Hindi Diwas ) पर सोमवार से ऑनलाइन फिल्म उत्सव शुरू किया है। इसमें हिन्दी पर पांच डॉक्यूमेंट्री फिल्में दिखाई जा रही हैं, जो फिल्म प्रभाग ने ही 1990 से 2011 के दौरान बनाई थीं। यह आयोजन रस्म अदायगी से ज्यादा कुछ नहीं है। हिन्दी दिवस से शुरू होने वाले ‘हिन्दी पखवाड़े’ के नाम पर इस तरह की रस्म हर साल निभाई जाती है। देश-विदेश में हिन्दी के प्रचार-प्रसार में ऐसे आयोजनों के मुकाबले उन हिन्दी फिल्मों का योगदान कहीं ज्यादा है, जो मराठी मानुसों के महानगर मुम्बई में बनती हैं और जो शुद्ध हिन्दी से उतनी ही दूर हुआ करती हैं, जितना जागती आंखों से सपना दूर होता है। आप गैर-हिन्दी प्रदेशों तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, गुजरात आदि में जाएंगे तो वहां के लोगों से जानने को मिलेगा कि उन्होंने हिन्दी फिल्में देखकर हिन्दी सीखी है।

दरअसल जिन्हें हिन्दी फिल्में कहा जाता है, उनकी भाषा हिन्दी नहीं, हिन्दुस्तानी है। यह हिन्दी और उर्दू के साथ कई क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों का संगम है। महात्मा गांधी आम बोलचाल की इसी भाषा के हिमायती थे। कुछ साहित्यकार भी हिन्दुस्तानी भाषा पर जोर देते रहे हैं। भवानी प्रसाद मिश्र की एक कविता की पंक्तियां हैं- ‘जैसा तू बोलता है, वैसा ही तू लिख।’ हिन्दी फिल्में शुरू से इस पर अमल कर रही हैं। ‘गंगा जमुना’ में दिलीप कुमार ने जब भोजपुरी अंदाज में ‘अरे ओ धन्नो’ (नायिका वैजयंतीमाला का नाम) बोला था तो इन तीन शब्दों के पीछे छिपे भाव को पूरा देश समझ गया था। इस फिल्म के 14 साल बाद ‘शोले’ के गब्बर सिंह (अमजद खान) ने यही अंदाज ‘अरे ओ सांभा’ में दोहराया तो ‘सांभा’ भी ‘धन्नो’ की तरह लोगों की जुबान पर चढ़ गया। यहां भाषा की सादगी के साथ दोनों अभिनेताओं की खास अदायगी भी असर पैदा कर रही है।

महबूब खान ने ‘मुगले-आजम’ बनाते समय खास ध्यान दिया कि इसके संवाद भारी-भरकम उर्दू के बजाय हिन्दुस्तानी में हों। इस फिल्म की कामयाबी में इसके संवादों का बड़ा हाथ रहा। इसके विपरीत कमाल अमरोही ने ‘रजिया सुलतान’ में अरबी-फारसी से लैस उर्दू के इतने मुश्किल अलफाज इस्तेमाल किए कि फिल्म देखने वाले ‘उर्दू-हिन्दी की डिक्शनरी कहां है’ की मुद्रा में आ गए। पहले ‘रजिया सुलतान’ का संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल तैयार करने वाले थे। एक गाने की सिच्युएशन समझाने के लिए उन्हें बुलाया गया। कमाल अमरोही ने कहा- ‘शब की तारीकी टूटने को है और दूर उफक पर आफताब तुलू होने वाला है’ (रात का अंधेरा टूटने को है और दूर क्षितिज में सूरज उगने वाला है)। यह जुमला सुनने के बाद लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने यह कहकर फिल्म छोड़ दी कि जब हम आपकी बात नहीं समझ पा रहे हैं तो संगीत कैसे तैयार करेंगे।
फिल्मी गानों में उर्दू का वर्चस्व रहा है, लेकिन जब भी गीतकारों को मौका मिला, उन्होंने शुद्ध हिन्दी में ‘चंदन-सा बदन चंचल चितवन’, ‘मन रे तू काहे न धीर धरे’, ‘कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे’, ‘तुम गगन के चंद्रमा मैं धरा की धूल हूं’, ‘ये कौन चित्रकार है’ और ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ सरीखे बेशुमार लोकप्रिय गीत रच दिए।





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