जयकिशन की बरसी पर विशेष: कल क्या हो, किसने जाना


-दिनेश ठाकुर
चालीस के दशक के आखिर में, जब भारतीय सिनेमा पारसी थिएटर के प्रभाव से आजाद होकर अपनी अलग जमीन तैयार कर रहा था, राज कपूर की ‘बरसात’ (1949) सिनेमाघरों में पहुंची और इसके संगीत ने जमाने को झुमा दिया। थोड़ा सुगम-शास्त्रीय, थोड़ा लोकगीत और थोड़ा पश्चिमी शैली का यह संगीत लोगों के लिए नया अनुभव था। फिल्म में ‘हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का’, ‘जिया बेकरार है’ और ‘मेरी आंखों में बस गया कोई’ समेत दस गाने थे। सभी लोकप्रियता के लिए जरूरी तत्वों से लैस। यह संगीतकार शंकर-जयकिशन ( Shankar Jaikishan ) की पहली फिल्म थी। एक तरह से यह भारतीय फिल्म संगीत की नई करवट की मुनादी भी थी। वांसदा (गुजरात) के जयकिशन पंचाल और हैदराबाद के शंकर रघुवंशी ‘बरसात’ में यूं ‘हमसे मिले तुम’ हुए कि फिल्म संगीत धन्य हो गया। फिल्मों में सबसे लम्बी पारी खेलने वाली यह पहली संगीतकार जोड़ी थी। बाद में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ( Laxmikant Pyarelal ) की पारी इससे भी लम्बी रही। इस जोड़ी के प्यारेलाल शर्मा आज शंकर-जयकिशन को याद करते हुए भावुक हो जाते हैं। वे कहते हैं- ‘फिल्म संगीत में जो कुछ भी जरूरी होता है, शंकर-जयकिशन के पास भरपूर था। उनका वाद्य-संयोजन कमाल का था। हमने उनके संगीत से बहुत कुछ सीखा।’

जयकिशन हारमोनियम के उस्ताद थे। मुम्बई पहुंचने से पहले वांसदा में उन्होंने संगीत विशारद वाडीलाल और प्रेमशंकर नायक से बाकायदा लय,ताल तथा रागों की तालीम ली। शंकर के साथ उनकी जोड़ी दो दशक तक फिल्म संगीत पर ध्रुव तारे की तरह छाई रही। हर बड़ा फिल्मकार, हर बड़ा कलाकार उनके संगीत का कायल था। पोस्टर पर शंकर-जयकिशन का नाम फिल्म की कामयाबी की गारंटी माना जाता था। वे ‘मेरा नाम जोकर’ (1970) तक राज कपूर की फिल्मों के स्थाई संगीतकार रहे। उनकी धुन वाले ‘आवारा हूं’ और ‘मेरा जूता है जापानी’ के दम पर राज कपूर की लोकप्रियता रूस तक जा पहुंची।

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शंकर-जयकिशन ने गीतकार शैलेंद्र और हसरत जयपुरी के साथ राज कपूर की फिल्मों के जरिए जो सुरीला इतिहास रचा, उसकी गूंज हमेशा बरकरार रहेगी- ‘मैं न रहूंगी, तुम न रहोगे, फिर भी रहेंगी निशानियां’ (श्री 420)। भैरवी को सदा सुहागन राग माना जाता है। शंकर-जयकिशन ने अपने इस पसंदीदा राग पर कमाल के गाने दिए- ‘सुनो छोटी-सी गुडिय़ा की लम्बी कहानी’, ‘तेरा जाना दिल के अरमानों का लुट जाना’, ‘तुम्हें और क्या दूं मैं दिल के सिवाय’ और ‘बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है।’ वैसे यह जोड़ी हर राग, मूड, रंग और शैली के गाने रचने में माहिर थी। चाहे वह धीर गंभीर ‘याद न जाए बीते दिनों की’ हो, लोकगीत शैली का ‘चलत मुसाफिर मोह लियो रे पिंजरे वाली मुनिया’ हो, शास्त्रीय ‘सुर न सजे क्या गाऊं मैं’ या खुली-खुली वादियों का एहसास जगाता ‘सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था’ या फिर जीवन दर्शन से लिपटा ‘जिंदगी इक सफर है सुहाना।’ शराब के अत्यधिक सेवन के कारण जयकिशन को बीमारी ने ऐसा जकड़ा कि 12 सितम्बर, 1971 को मुम्बई के एक अस्पताल में उनका सुहाना सफर सिर्फ 41 साल की उम्र में थम गया। सुरों के दो कामयाब हंसों को इस तरह बिछुड़ना था।





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