एक और पीरियड फिल्म का ऐलान, इतिहास की झांकियों का दौर


-दिनेश ठाकुर
माक्र्स गर्वे का कौल है- ‘वे लोग जड़विहीन पेड़ों की तरह होते हैं, जो अपने इतिहास, स्रोत और संस्कृति के बारे में नहीं जानते।’ फिराक गोरखपुरी फरमाते हैं- ‘गुजश्ता अहद (बीते दौर) की यादों को फिर करो ताजा/ बुझे चिराग जलाओ, बहुत अंधेरा है।’ भारतीय सिनेमा में बुझे चिराग जलाने का सिलसिला जारी है। या यूं कहा जाए कि ‘बाहुबली’ के कुबेर का खजाना साबित होने के बाद इस सिलसिले में नए सिरे से तेजी आ गई है। वर्ना ‘लगान’ और ‘गदर एक प्रेमकथा’ के बाद फिल्मकारों में पीरियड फिल्मों के प्रति ऐसा मोह नहीं जागा था, जो ‘बाहुबली’ के बाद जागा है। बुधवार को तेलुगु सिनेमा के सुपर सितारे पवन कल्याण की 49वीं सालगिरह पर उनकी दो नई फिल्मों का ऐलान किया गया। इनमें से एक बड़े बजट की पीरियड फिल्म होगी, जिसमें उनके साथ बॉलीवुड के सितारे भी नजर आएंगे। हाल ही पवन कल्याण के बड़े भाई चिरंजीवी की 65वीं सालगिरह पर भी उनकी नई पीरियड फिल्म ‘आचार्य’ का ऐलान किया गया था।

चिरंजीवी की तरह पवन कल्याण भी सिनेमा के साथ-साथ सियासत में भी सक्रिय हैं। कभी वे बड़े भाई की प्रजा राज्यम पार्टी का कामकाज संभालते थे। इस पार्टी के कांग्रेस में विलय के बाद उन्होंने जन सेना नाम की अलग पार्टी बना ली, जो भाजपा की समर्थक है। यानी दूसरे कई सियासी परिवारों की तरह यहां भी परिवार में अलग-अलग विचारधाराएं बह रही हैं। तीन साल पहले पवन कल्याण ने पूरी तरह सियासत में सक्रिय होने का इरादा जताया था, लेकिन अब उनकी नई फिल्मों के ऐलान से साफ हो गया कि फिलहाल वे दोनों नावों में सवारी जारी रखेंगे। इन दिनों उनकी तेलुगु फिल्म ‘वकील बाबू’ की शूटिंग चल रही है। यह अमिताभ बच्चन और तापसी पन्नू की ‘पिंक’ का रीमेक है।

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बहरहाल, दक्षिण की तरह बॉलीवुड में भी कुछ पीरियड फिल्में तैयार हो रही हैं। कंगना रनोत को लेकर तमिलनाडु की दिवंगत मुख्यमंत्री जे. जयललिता की बायोपिक ‘थलाइवी’ निर्माण के आखिरी चरण में है। निर्देशक करण मल्होत्रा की ‘शमशेरा’ (संजय दत्त, रणबीर कपूर) अठारहवीं सदी के भारत की झांकी दिखाएगी तो संजय लीला भंसाली की ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ (आलिया भट्ट) में साठ के दशक की मुम्बई का अपराध जगत होगा। भंसाली एक और पीरियड फिल्म ‘बैजू बावरा’ भी बनाने वाले हैं। दूरदर्शन के लिए ‘चाणक्य’ सीरियल बनाने वाले चंद्रप्रकाश द्विवेदी की ‘पृथ्वीराज’ (अक्षय कुमार, मानुषी छिल्लर) में बारहवीं सदी का भारत होगा। पीरियड फिल्में बनाना दोधारी तलवार पर चलने जैसा है। फिल्म न चले तो भारी घाटा और तथ्यों में जरा-सी ऊंच-नीच हो जाए तो कैसा हंगामा होता है, यह हम ‘जोधा-अकबर’ और ‘पद्मावत’ के समय देख चुके हैं।





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